चुनौतियों से निपटने का सामर्थ्य देती है उचित शिक्षा : प्रो. त्रिपाठी

बुविवि में शिक्षा पर दो दिनी राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू

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झांसी। उचित शिक्षा मनुष्य को जीवन की विविध चुनौतियों से निपटने का सामर्थ्य प्रदान करती है। हमें शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियों को अपने आचरण में सुधार लाकर दूर करना होगा। उक्‍त विचार बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के शिक्षा संस्थान की ओर से आयोजित दो दिनी राष्ट्रीय संगोष्ठी में उपस्थित शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को संबोधित करते हुुुए प्रख्यात शिक्षाविद् और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने व्‍यक्‍त किए।
प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि किसी राष्ट्र का निर्माण एक दिन में नहीं होता है। सामर्थ्यवान और चरित्रवान लोग ही राष्ट्र का निर्माण करते हैं। भारत का दुनिया में कोई सानी नही है। हमारे देश के ऋषियों और मुनियों ने अपने अनुभवों के आधार पर मूल्यों और सिद्धांतों का प्रतिपादन और प्रसार किया। मूल्य जीवन और जगत के प्रति हमारे दर्शन के आधार पर आते हैं। हमारा भारतीय दर्शन वसुधैव कुटुंबकम, सर्वे भवंतु सुखिनः का प्रबल समर्थक रहा।

भारतीय दर्शन मानता है कि ब्रह्मांड परमात्मा का स्वरूप है। ऐसे में हम सभी एक ही परिवार के सदस्य हैं। उन्होंने कहा कि विचारों में भिन्नता स्वाभाविक है लेकिन हमारा दर्शन एक साथ मिलकर बात करने और सही राह निकालने का हामी रहा है। उन्होंने राम की मां कौशल्या का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि प्राचीन काल में नारी और मां को कितना अधिकार और सम्मान प्राप्त था। राजा दुष्यंत का उदाहरण देते हुए यह रेखांकित किया कि एक राजा अपने कर्तव्यों के प्रति कितना सतर्क था। प्रो. त्रिपाठी ने वर्तमान हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि आज हम अधिकारवादी राष्ट्र के रूप में खड़ा होना चाहते हैं लेकिन असलियत यह है कि हम इस रूप में तब तक नहीं खड़ेे हो सकते जब तक कर्तव्यों का बोध हर व्यक्ति को न हो। कर्तव्यों के सही निर्वहन के बाद ही अधिकार मिलते हैं। ऐसी उचित शिक्षा हमने अपने युवाओं को नहीं दी। यही वजह है कि आज के युवाओं में संयम का अभाव दिखता है। जो कुछ हमने 60 साल में हासिल किया, उसे हमारा पु़त्र कुछ दिनों में हासिल करना चाहता है।

वो भी बिना कुछ किए। इसका कारण यही रहा कि हम उसे सही ढंग से समझा नहीं पाए। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल मस्तिष्क का ही नहीं वरन हृदय का भी परिस्कार करती है। यह मनुष्य को विभिन्न चुनौतियों से निपटने में सामर्थ्यवान बनाती है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य सामर्थ्यवान व्यक्तित्व का निर्माण करना है। उम्मीद है कि हम अपेक्षित सुधार कर शिक्षा को और अर्थपूर्ण बनाएंगे। उन्होंने कहा कि समाज उसी को सम्मान देता है जो अपनी शक्ति का प्रयोग समाज के दूसरे लोगों का जीवन सुधारने में करे।
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति साहित्य भूषण प्रो. सुरेंद्र दुबे ने कहा कि यह देश दुर्भाग्य रहा कि आजादी के बाद इसके प्रेरणास्रोत बदल गए। हम शिक्षा के माध्यम से केवल मस्तिष्क को संवारने के प्रयास में लगे रहे। हमने यह जानने की कोशिश नहीं की कि शिक्षा हृदय का परिस्कार कर रही है या नहीं। आज जरूरत इस बात की है कि हम भारतीय संस्कृति के मूल्यों को ध्यान में रखकर शिक्षा क्षेत्र में उचित सुधार करें। हम मूल्यों को अपने जीवन में ढालकर आगे बढ़ें ताकि देश प्रगति के पथ पर अग्रसर हो। प्रो. दुबे ने गोस्वामी तुलसीदास की रचना ‘परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई’ का जिक्र करते हुए कहा कि हमारे ऋषियों और मुनियों ने पाप और पुण्य की परिभाषा जितने संक्षिप्त रूप से दी वो अतुलनीय है। विवेकानंद, केशवचंद सेन, महात्मा गांधी और डा. भीमराव रामजी आंबेडकर का उदाहरण सामने रखते हुए प्रो. दुबे ने कहा कि इन लोगों ने अपने आचरण और मूल्यों से समाज को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। यही कारण है कि समाज उन्हें आज भी आदर से याद करता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगे शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त अंधेरा छंटेगा।
दयालबाग शिक्षा संस्थान, आगरा के प्रो. केसी वशिष्ठ ने कहा कि हमारा अतीत काफी स्वर्णिम रहा है। इसी कारण दुनिया के अनेक देशों के लोग हमारे यहां अध्ययन और ज्ञान हासिल करने आते थे। उन्होंने कहा कि शिक्षा क्षेत्र को टिकाऊ संरक्षण देने की जरूरत है। पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एक बार फिर अपने हाथ सिकोड़ रहा है जो ठीक नहीं है।
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के डीन एजुकेशन डा. ओंकार चौरसिया ने कहा कि आज शिक्षा अपने उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर पा रही है। कभी शिक्षक पूरे समाज को दिशा देते थे लेकिन आज राजनीतिक लोग शिक्षकों को दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। आज का समय शिक्षकों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण है। मूल्यों का संरक्षण नारों या भाषणों से नहीं वरन अनुकरण से ही हो सकता है। हमें शिक्षा क्षेत्र की दशा को सुधारने का प्रयास संजीदगी से करना होगा। बुविवि के वित्त अधिकारी धर्मपाल ने कहा कि नैतिकता की दृष्टि से हमारा देश बहुत आगे रहा है। लेकिन यह बात भी सच है कि पिछले कुछ दशकों में नैतिकता का ह्रास हुआ है। हमें अपनी सोच को सकारात्मक बना समाज को सही दिशा देनी होगी।
इससे पहले संगोष्ठी में आए अतिथियों का स्वागत करते हुए संयोजक प्रो.पीसी शुक्ल ने कहा कि शिक्षा क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ा है। ऐसे में परिसरों में असंतोष भी बढ़ा है। शिक्षण संस्थाओं का स्तर गिरने से विद्यार्थियों का शोषण हो रहा है। आज शिक्षा ने बाजार का रूप धारण कर लिया है यह चिंता का विषय है। उन्होंने कुलपति प्रो. दुबे के प्रयासों से अगले सत्र में 12 विषयों में बीए आनर्स की कक्षाएं शुरू होने की बात का जिक्र भी किया। इसके लिए शासन की संस्तुति मिलने की भी जानकारी दी।
इससे पहले अतिथियों के स्वागत की रस्म अदा की गई। अतिथियों ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन कर संगोष्ठी का शुभारंभ किया। उन्होंने संगोष्ठी की स्मारिका का विमोचन भी किया। अंत में सह संयोजक डा. धीरेंद्र सिंह यादव ने सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उद्घाटन सत्र का संचालन डा.शैरेन पॉल तथा इंजी.अनुपम व्यास ने किया।
इस अवसर पर कुलसचिव सीपी तिवारी, कुलानुशासक प्रो. एमएल मौर्य, डीएसडब्ल्यू प्रो. सुनील काबिया, प्रो. वीके सहगल, प्रो. वी.पी. खरे, प्रो. अपर्णा राज, प्रो. आरके सैनी, डा. डी.के भट्ट, डा. काव्या दुबे, डा. रश्मि सिंह, डा.सी.पी.पैन्यूली, डा. सुषमा अग्रवाल, डा. बालेंदु सिंह, डा.प्रकाश सिंह, डा. अंकित श्रीवास्तव, डा. विजय यादव, उमेश शुक्ल, डा.प्रशांत मिश्र. डा.कमलेश शर्मा, डा.किरण शर्मा, इंजीनियर राहुल शुक्ला, सतीश साहनी, कन्हैयालाल सोनकर समेत अनेक शिक्षक उपस्थित रहे।
उद्घाटन सत्र के पश्चात नैतिकता एवं आधुनिक समाज विषयक प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डा.ओमकार चौरसिया ने की। इस सत्र में डा.राजेश पालीवाल, डा. देवकी सिरोला, डा.मनीष कुमार जैन, डा.शरद चौरसिया, डा.बृजेश पाण्डेय, डा.संजय कुमार, डा.दीप्ति कुमारी, डा.ऊमा शर्मा, डा.रवि कुमार, डा.रणधीर सिह यादव ने अपने अपने शोध के निष्कर्षो को उपस्थित श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत किया।
आज के द्वितीय तकनीकी सत्र का विषय हमोर प्राचीन शिक्षा प्रणाली के पक्ष में आधुनिक वैज्ञानिक तथ्य था। सत्र की अध्यक्षता डा.दिनेश सिंह ने की जबकि प्रो.श्याम सुन्दर ने तकनीकी विशेषज्ञ की भूमिका का निर्वहन कियां। इस सत्र मे डा. अखिलेश कुमार, डा.योगेश पाल आदि ने अपने अपने शोधपत्र प्रस्तुत करते हुए शोध निष्कर्षो का विश्लेषण किया। सांय सात बजे से विश्वविद्यालय के गॉधी सभागार में एक सांस्कृतिक सन्ध्या का आयोजन किया गया, जिसमें बुन्देलखण्ड क्षेत्र की संस्कृति की झलक संगोष्ठी में आये अतिथियों को देखने को मिली। इसके पश्चात पद्मश्री डा.सुनील जोगी का एकल काव्यपाठ हुआ। डा.जोगी के काव्यपाठ की सभागार में उपस्थित दर्शकों ने मुक्त कण्ठ से सराहना की।

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