हिम्‍मत और जज्‍बे से बने झांसी के पहले फोटो जर्नलिस्‍ट

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एक समय था जबकि फोटो जर्नलिस्‍ट के लिए स्‍पाॅॅॅट रिर्पोटिंग उसके काम का बहुत महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा होती थी। तब आज की तरह तकनीक इतनी अधिक हाईफाई नहीं थी। ऐसे में हिम्‍मत और जज्‍बे की बहुत आवश्‍यकता हुआ करती थी। ऐसा ही एक नाम जो आज झांसी के पहले सफल फोटो जर्नलिस्‍ट के रुप में सामने आया है। इसका उन्‍होंने कभी घमण्‍ड नहीं किया। उनकी इतनी खूबियां होने के बावजूद आज उनको जो सम्‍मान मिलना चाहिए, उससे वह काफी दूर हैंं। आज उन्‍होंने ख्‍ाुुुद को फोटो जर्नलिस्‍ट की नई पौध तैयार करने में खुद को व्‍यस्‍त किया हुआ है। झांसी महानगर के पहले फोटो जर्नलिस्‍ट सतीश साहनी ने अपनी सफलता की कहानी एशिया टाईम्‍स की सम्‍पादकीय टीम के वरिष्‍ठ सदस्‍य एवं पूर्व सम्‍पादक दैनिक भ्‍ाास्‍कर झांसी डॉ. हरिमोहन अग्रवाल के साथ शेयर की।
स्‍व. श्री बाबूलाल साहनी व स्‍व. श्रीमती किशोरी देवी के सुपुत्र सतीश साहनी अपने पांच भाईयों में सबसे बड़ेे थे। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार के रुप में फोटोग्राफी को अपनाया और फिल्‍मालय स्‍टूडियों में सन 1966 में कार्य प्रारम्‍भ किया। आज भी उनके पास पुराने समय से लेकर आज तक के एक से एक कैमरे मौजूद हैं। अपने काम के दौरान उन्‍होंने दैनिक जागरण में अपनी सेवाएं देना प्रारम्‍भ किया और काफी महत्‍वपूर्ण फोटोज खींची। श्री साहनी जी ने अपनी कहानी बताते हुए कहा कि वह जागरण में अधिक समय काम नहीं कर पाए और उसके बाद अपना खुद का मोठ में स्‍टूडियाेेे खोल लिया। 1973 से 1983 तक फोटो स्‍टूडियो चलाने के बाद वह दैनिक भास्‍कर के फोटोग्राफर बन गए। यहांं से एक महत्‍वपूर्ण समय शुरु हुआ और उनको कई महत्‍वपूर्ण व खतरनाक टारगेट मिले, जिनको उन्‍होंने पूरा किया। इस दौरान कई बार उनको लोगों की धमकियां भी मिलती रहीं। उनको एक टारगेट मिला, जिसमें सूचना मिली कि दस्‍यु फूलन देवी पुलिस में अात्‍म समर्पण करने जा रही है। ऐसे में वह अपने संस्‍थान के पत्रकार के साथ भिण्‍ड के आगे ग्राम टहनपुर में फूलन देवी की फोटो करने गए, जहां उनको धमकी दी गई कि यह फोटो उनके आत्‍मसमर्पण से पहले नहीं छपनी चाहिए। ऐसा ही एक टारगेट दूसरा मिला, जिसमें दस्‍यु सुंदरी कुसुमा नाईन का इण्‍टरव्‍यू करने का मौका मिला। आगे भी ऐसे कई मौके आए, जबकि स्‍पॉट रिपोर्टिंग करने जाना पड़ता था, जिसमें ट्रेन हादसा, अपहरण, डकैती, झगड़ा फसाद आदि सहित कई ऐसे मामले होते थे। उन्‍होंने बताया कि स्‍टार फोर्ट की तस्‍वीर सबसे पहले उन्‍होंने ही खींची थी। एक मौका ऐसा भी आया, जबकि पहलवानों के अखाड़ों की फोटो और स्‍टोरी छापनी थी। उस दौरान जिन अखाड़ों की स्‍टोरी नहीं छापते थे, तो अक्‍सर पहलवानों द्वारा धमकियां दी जाती थीं। उसके बाद उन्‍होंने सदर बाजार में 1985 में अपना स्‍टूूूूडियो खोल लिया। बाद में उसमें आग लगने के कारण सारा फोटो का कलेक्‍शन जल गया। इससे उनका काफी नुकसान हो गया। उसके बाद वह बुन्‍देलखण्‍ड विश्‍वविद्यालय मेंं नए विद्यार्थियों को फोटो जर्नलिज्‍म सिखा रहे हैं। उनकेे दो पुत्र हैं, बड़े देवेश साहनी कम्‍प्‍यूटर विशेषज्ञ होने के साथ ही समाचार पत्रों में पेज मेकिंग का काम करते हैं। दूसरा प्रभात साहनी अपने पिता की तरह फोटो जर्नलिस्‍ट है।

जब खुद बनाया जूम लैन्‍स

उन्‍होंने अपनी कहानी सुनाते हुए बताया कि आठ दिसम्‍बर 1992 को जब पूरे देश में कर्फ्यू लगा था और माताटीला में भाजपा के कई वरिष्‍ठ नेताओं के लिए अस्‍थाई जेल बनाई गई थी। उनकी फोटो खींचना था और अंदर जाना नहीं था। तब उन्‍होंने खुद अपना एक जूम लैन्‍स बनाया था और फोटो खींची। इस फोटो को काफी पसंद किया गया। उन्‍होंने बताया कि कुछ मौकेे ऐसे भी आए, जबकि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के झांसी दौरे पर फोटोग्राफी भी की।

शादी वाले दिन कर रहे थे फोटोग्राफी

उन्‍होंने बताया कि उस समय वह अकेले फोटोग्राफर थे, जिनकाेे प्रशासनिक फोटो खींचनेे के लिए जाने दिया जाता था। एक समय ऐसा आया कि 27 फरवरी के दिन उनकी शादी थी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का झांसी आना हुआ। उस दिन सुुुुरक्षा घेरे में जाने के लिए उनका ही नाम लिखा था। ऐसे में अपनी शादी के काम छोड़कर शाम तक उनको फोटोग्राफी तैयार करने जाना पड़ा। उसके बाद प्रेस में फोटो देकर ही वह अपनी शादी में जा पाए।

स्‍पॉट रिपोर्टिंग के लिए तैयार किया था रिमोट वाला कैमरा

श्री साहनी जी ने बताया कि कई बार प्रशासनिक तौर पर या फिर किसी अन्‍य कारण से फोटाग्राफी करने से मना कर दिया जाता था, लेकिन उन फोटो को खींचने के लिए हर समय कैमरा ऑन रखना पड़ता था। ऐसे में रील जल्‍दी खत्‍म हो जाती थी, जिसके कारण उन्‍होंने एक रिमोट तैयार किया। इससे रिकार्डिंग को जरुरत न होने पर रोक दिया जाता था। वह रिमोट हमेशा अपनी जेब में रखा करते थे।

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