आपदा प्रबन्धन कम कर सकता है आपदाओं से होने वाला नुकसान: मनोज वर्मा

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झांसी। आपदाओं विशेषकर प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है, न ही इन्हें रोका जा सकता है लेकिन इनके प्रभाव को एक सीमा तक जरूर कम किया जा सकता है, जिससे कि जान-माल का कम से कम नुकसान हो। यह कार्य तभी किया जा सकता है, जब सक्षम रूप से आपदा प्रबंधन का सहयोग मिले। यह विचार झांसी के वरिष्ठ सहायक उपनियन्त्रक, नागरिक सुरक्षा कोर मनोज वर्मा ने व्यक्त किये। श्री मनोज वर्मा आज बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय परिसर में संचालित राष्ट्रीय सेवा योजना की षष्टम इकाई के तत्वाधान में आयोजित विशेष शिविर के पाचवें दिन बौद्धिक सत्र में पत्रकारिता संस्थान के प्रांगण में राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवकों को सम्बोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक वर्ष प्राकृतिक आपदाओं से अनेक लोगों की मृत्यु हो जाती है, इससे सर्वाधिक प्रभावित होने वाले देशों में भारत का दसवां स्थान है। श्री वर्मा ने कहा कि आपदा प्रबंधन के दो महत्वपूर्ण आंतरिक पहलू हैं, पूर्ववर्ती और उत्तरवर्ती आपदा प्रबंधन। आपदा प्रबंधन का पहला चरण है खतरों की पहचान। इस अवस्था पर प्रकृति की जानकारी तथा किसी विशिष्ट अवस्थल की विशेषताओं से संबंधित खतरे की सीमा को जानना शामिल है। साथ ही इसमें जोखिम के आंकलन से प्राप्त विशिष्ट भौतिक खतरों की प्रकृति की सूचना भी समाविष्ट है। इस अवसर पर ट्रैफिक वार्डन, झांसी सुश्री दीपशिखा शर्मा ने कहा कि जब प्रकृति में असंतुलन की स्थिति होती है, तभी आपदायें आती हैं जिसके कारण विकास एवं प्रगति बाधक होती है। प्राकृतिक आपदाओं जैसे- भूकम्प, सुनामी, भूस्खलन, ज्वालामुखी, सूखा, बाढ़, हिमखण्डों का पिघलना के अतिरिक्त कुछ विपत्तियाँ मानवजनित भी होती हैं। सुश्री शर्मा ने कहा कि धैर्य, विवेक, परस्पर सहयोग व प्रबंधन से ही इन आपदाओं से पार पाया जा सकता है। वहीं इस अवसर पर शिविरार्थियेां को सम्बोधित करते हुए घटना नियन्त्रण अधिकारी सुश्री प्रगति शर्मा ने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं को आपसी सामन्जस्य, धैर्य तथा सामान्य ज्ञान से ही उनका प्रभाव कम किया जा सकता है। इस हेतु जन साधारण को भी आपदा प्रबन्धन के बारे में जानकारी होनी चाहिये। बौद्धिक सत्र का संचालन करते हुए विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय सेवा योजना की षष्टम इकाई के कार्यक्रम अधिकारी डा.उमेश कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया तथा शिविर के उद्देश्यों को मंचासीन अतिथियों तथा स्वयंसेवकांे के समक्ष रखा। इस अवसर पर स्टेªचर न होने पर किसी मरीज को अस्पताल पहुचाने हेतु किस कृत्रिम स्टेªचर बनाने की विधि बताई। इसके साथ ही साथ स्टेªचर उपलब्ध न होने पर भी किसी घायल या बीमार को अस्पताल तक कैसे पहुचाया जा सकता है इसका भी प्रदर्शन शिविरार्थियों के समक्ष किया। इस अवसर पर उमेश शुक्ला, डाॅ. जयसिंह, सतीश साहनी, डा. बी.एस.भदौरिया, डा. अजय कुमार गुप्ता, डा. दिलीप कुमार, जयराम कुटार, अभिषेक कुमार, रजनीकान्त आर्य उपस्थित रहे।

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