लघु कथाओं का यह संकलन , आपकाे सोचने पर जरुर मजबूर करेगा (प्रथम भाग)

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गुड़गांव से एक पत्रकार श्रीमती प्रिया भाटिया के संकलन में से कुछ लघु कथाएं, जो आज के सामाजिक ताने बाने पर आधारित हैं और इनको पढ़ने के बाद हमको एक सीख तो मिलती ही है। साथ ही कई बार यह अहसास होता है कि कहीं हम बहुत गलत थे, तो कई बार अपने आप पर फख्र महसूस होता है। ऐसे में इनको पढ़ने से खुद को रोकना मुश्‍िकल होगा।

आफिस से जरा जल्‍दी आना

“सुनो जी ! आप आफिस से जल्दी आना !” शीला ने आफिस जाने के लिये तैयार होते सौरभ से कहा।
” नही नही मै जल्दी नही आ सकता..बहुत पेंडिग काम पड़ा है !” सौरभ ने छूटते ही कहा।
“क्यो जी …क्या बीबी बच्चे नही है घर में? आफिस का कोई टाईम लिमिट नही होता क्या ? हमारे लिये समय नही तो ब्याह कर क्यो लाये ? “शीला ग़ुस्से से फट पड़ी।
“सुनो ये ग़ुस्सा किसी और को दिखाना समझी? ये जो तुम्हारे ठाठ बाठ है ना वह सब मेरे आफिस मे काम करने के कारण ही है! मुफ़्त मे बैठे बिठाये सब मिल रहा है इसलिये दूध से भी खाँसी हो रही है?” सौरभ भी आपे से बाहर हो गया।
“तो फिर ठीक है ये भी जान लो की मेरी भी नौकरी लग गई है और अगले हफ़्ते से मै काम पर जाऊँगी !”-शीला ने पटाखा फोड़ा।
“क्या …? नौकरी तुम्हारी? पागल हो गई हो क्या? घर और बच्चे कौन सम्भालेगा ?” सौरभ के ग़ुब्बारे से हवा रिसने लगी।
“तुम नौकरी छोड देना और घर -बच्चे सम्भालना…तुम्हे भी बैठे बिठाये सब मिल जायेगा..परेशान क्यो होते हो?” यह कहकर शीला ने उसे घूरा!
सौरभ ने कुछ देर शीला को निहारा और हथियार डाल दिये! मोबाईल फोन पर आफिस मे बॉस का नम्बर मिलाया और बोला-“सर आज मै पेंडिग काम आफिस समय पर कर लूँगा ..घर पर ज़रूरी काम है।”
फोन बंद कर शीला की तरफ़ मुख़ातिब होकर बोला-“आज डिनर हम सब बाहर करेंगे और मूवी भी देखेंगे ” फिर कुछ देर रूका और आहिस्ता से पूछा-“तुम्हारा वह नौकरी का विचार…..?
“अब त्याग दिया ” कहकर शीला खिलखिलाई !

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क्‍या हम कहीं मिल सकते हैं

क्या हम मिल सकते है आज रात, कहीं बाहर? उत्तर की प्रतीक्षा में तुम्हारा मित्र!” ‘गुड़ मॉर्निंग’ के साथ लिखे शब्द फिर से दिमाग में खेलने लगे थे।

पिछले कुछ महीनों से पति की बेरुखी और बेटी के पढ़ाई के लिये ‘हॉस्टल’ जाने के बाद, जीवन में आये नितांत खालीपन को भरने के लिये उसने ‘सोशल साईट’ की ओर रुख किया था। वहीँ ये ‘मित्रता अनुरोध’ आया था जिसे उसने सहज ही स्वीकार कर लिया और फिर जल्दी ही उसकी रसभरी भाषा, प्रेम-आतुर वार्तालाप से वह भी उसमें दिलचस्पी लेने लगी थी। उसे स्वयं भी पता नहीं लगा कि कब वह ‘चैटिंग’ के जरिये उसके रंग में रंग गयी थी लेकिन आज इन शब्दों पर वह असमंजस के दोराहे पर आ खड़ी हुयी थी।
“नही यूँ एक अजनबी पुरुष के साथ ऐसे मिलना ठीक नही!” आईने में मुस्कराते अपने ही अक़्स को देखकर सकपका गयी वह।
“लेकिन अजनबी कहाँ, वह तो तुम्हारा मित्र है न!” उसके अक्स ने आवाज़ दी।
“हाँ, वह तो है लेकिन मेरा इस इस तरह घर-परिवार की सीमाओं से निकल बाहर जाना ठीक नही।” उसने अपनी सीमाएँ बतानी चाही।
“लेकिन तुम्हारी भी कुछ् जरूरतें है जो पूरी नहीं हो पाती, कब तक पति की बेरुखी के साथ जिओगी।” आईना अब मुखर होने लगा था।
“जरूरतें!…. लेकिन एक पत्नी के साथ युवा होती बेटी की माँ हूँ मैं, मेरे संस्कार मुझे इसकी इजाज़त नही देते।”
“ऑन लाइन हरी बत्तियों के बीच, लिखे शब्दों में जाने कितनी बार अपनी सीमायें लांघने के बाद अब वास्तविक धरातल पर तुम्हे संस्कार की लाल बत्तियां नज़र आ रही है।” आईना खिलखिला उठा। “जाओ अपनी जिंदगी जिओ, तोड़ दो सारी मर्यादा।” अक्स एक बार फिर हावी हुआ।
“नहीं!” वह सिहर उठी। “यदि मैं भी वही करूँ जो ये करते है तो क्या फर्क रह जायेगा मुझमें और उनमें!”

“तो जियो वही घुटन भरी जिंदगी।” अक्स अट्टाहस कर उठा।
अट्ठहास ने सहज ही मन में एकाएक आक्रोश पैदा कर दिया और और कुछ ही क्षण में वह आक्रोश से मुक्त हो, दोराहे से वापिस लौट रही थी।
“…….. आखिर मेरा मैं सफ़ल हो ही गया।” कई टुकड़ो में बिखरा अक्स हवा हो गया। आईना अब मुस्करा रहा था।

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सत्‍संग

किसी बाबा के सत्संग में जाने के लिए सीमा तैयार हो रही थी ।
ओहहह … …. तैयारी देखकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी शादी में जा रही हो। साथ में पानी की बोतल, कुरकुरे,लेज और कई तरह के स्नैक्स।
राजन पुछ बैठा ; मैं ऑफिस जा रहा हूँ और तुम सत्संग में फिर बबलू स्कूल से आयेगा तो उसे कपड़े बदलकर खाना कौन खिलायेगा ?
बच्चा है कम से कम उसका बचपन तो मत छीनो।
क्या मैंने ठेका ले रखा है ; आपके और आपके बेटे की चाकरी दिन भर करने का।
ऐसा काहे बोलती हो ? अभी वो बच्चा है। और इतनी छोटी सी उम्र में टेबलेट खरीद कर दे दिया हमेशा पूरे घर में नेट की सुविधा है ।
तो उसको माँ से क्या काम वह अपना मनपसंद कार्टून देख कर मन बहला लेगा ।
राजन झुंझलाते हुए बोला तुमसे तो बात करना बेकार है आज अपनी नई साड़ी और लिपस्टिक का नया ब्रांड अपनी सखियों को दिखाने जा रही हो और बहाना भी कितना सुंदर ; भई वाह…सत्संग सुनना।
पार्क में जाओ तो स्नैक्स और कोल्ड ड्रिंक्स ,, सत्संग में जाओ तो थैला भरकर।
अपनी खुशी और अपनी मस्ती के नित नये बहाने ढूँढ ही लेती हो।
बस बस भाषण मत दो। तुम्हारे इन्हीं भाषणों को सुनकर ही तो मुझे लगता है मैं डिप्रेशन में जा रही हूँ । पत्नी हूँ तुम्हारी कोई नोकरानी नहीं और जब भी मैं सज संवर कर बाहर जाना चाहती हूँ तुम्हारे क्लेश के कारण मन और खराब हो जाता है।
ठीक है ठीक है जो मर्जी हो करो ; मैं तो इस घर में कमाने की मशीन बन कर रह गया हूँ । हे भगवान …. ऐसी बीवी और ऐसा घर का माहौल दुश्मन को भी नहीं देना कहते हुए राजन ऑफिस चला गया।
सीमा भी गमले के नीचे चाभी रखकर अपना बैग कंधे पर लटका कर सत्संग सुनने चल दी , बबलू को बोल दिया था बेटा मैं आज सत्संग सुनने जाऊँगी और चाभी गमले के नीचे रख जाऊँगी।
डायनिंग टेबल पर नाश्ता रखा है ओवन में गरम करके खा लेना।
अपनी व्यवहार कुशलता का बखान करते हुए सत्संग के दो शब्द भी कानों तक पहुंचने के बाद भी स्मरण नहीं रहा ।
घर लौटने समय सीमा काफी खुश थी उसकी नई डिजाइनर साड़ी देखकर सखीयों ने तारीफ की थी , और वो चुड़ैल अलका तो जल भुन कर कोयला हो गई , सत्संग का असली आनंद मिल गया।

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